Monday, June 5, 2017

Bhuiyar (भुइयार) on wikipedia

Bhuiyar (भुइयार) 

From Wikipedia, the free encyclopedia
Bhuiyar
Regions with significant populations
India
Languages
Hindi
Religion
Hinduism 100%
The Bhuiyar or Bhuyiar are a Hindu caste found in the state of Uttar Pradesh in India. They have scheduled caste status and are also known as Bhanyar Julaha / Kori / Koli / Tantuvay / Megh / Kabir Panthi /. The traditional occupation of the Bhuiyar caste is weaving but that has declined due to mechanisation.[1]

Origin[edit]

The word bhuiyar is a corruption of the bhumi hara, which in Hindi means a landowner. They are group of Munda tribesmen who settled in southern and Western Uttar Pradesh in the 16th century. They were a community that historically were involved with weaving and some were involved slash and burn agriculture, and occupied the hilly terrain of south Mirzapur district. The Bhuiyar are further divided into sub-divisions, which are referred to as kori / Koli / Kabir Panthi / Bhanyar Julaha. Their main koris are the Baria, Birkunia, Chandnihys, Chetrihya, Chiriha, Dioriya, Khutta, Parha, Patparaha and Sudha. They are strictly endogamous, and practice clan exogamy. The Bhuiyar are found in the districts of Sonbhadra, Bijnor, moradabad, Saharanpur, Meerut, Mujaffar Nagar, Ghaziabad and Mirzapur. They speak Hindi, having long forgotten their Munda language.[1]

Present circumstances[edit]

The Bhuiyar are now a community of settled agriculturists. Their earlier slash and burn practices have disappeared. Most Bhuiyar are a small and medium sized farmers, with a minority being employed as agricultural labourers. Many are now also employed in the mines that have appeared in Mirzapur district. They live in multi-caste villages, occupying their own distinct quarters. They have much in common with neighbouring tribal communities such as the Kol, Agariya and Chero. Each of their settlement contains an informal caste council, known as a biradari panchayat. The panchayat acts as instrument of social control, dealing with issues such as divorce and adultery.[1]
The 2011 Census of India for Uttar Pradesh showed the Bhuiyar population as 28,360.[2]

References[edit]

  1. ^ Jump up to:a b c People of India Uttar Pradesh Volume XLII Part One edited by A Hasan & J C Das pages 307 to 312 Manohar Publications
  2. Jump up^. Registrar General & Census Commissioner, India. Retrieved 2017-02-04.

Sunday, June 4, 2017

संत कबीर साहेब जन्मोत्सव

भुइयार  समाज द्वारा 09 जुन 2017 को  संत कबीर साहेब जन्मोत्सव मनाने का निर्णय ।

अमर उजाला ०४ जुन २०१७ की खबर
















http://epaper.amarujala.com/bj/20170604/07.html?format=img

Bhuiyar Daya Ram Singh Bhamra

Haridwar

Thursday, June 1, 2017

बुनकरों (Bhuiyar) की अकबर के समय की स्थिति


1580 ई0 में मुगल बादशाह अकबर ने फारस से कुछ कालीन बुनकरों (Bhuiyar / Kori) को अपने दरबार में बुलाया था। इन बुनकरों ने कसान, इफशान और हेराती नमूनों के कालीनें अकबर को भेंट की। अकबर इन कालीनों से बहुत प्रभावित हुआ उसने आगरा, दिल्‍ली और लाहौर में कालीन बुनाई प्रशिक्षण एवं उत्‍पाद केन्‍द्र खोल दिये। इसके बाद आगरा से बुनकरो का एक दल जी0 टी0 रोड के रास्‍ते बंगाल की ओर अग्रसर हुआ। रात्रि विश्राम के लिए यह हल घोसिया-माधोसिंह में रूका। इस दल ने यहाँ रूकने पर कालीन निर्माण का प्रयास किया। स्‍थानीय शासक और बुनकरों (जुलाहों) के माध्‍यम से यहाँ कालीन बुनाई की सुविधा प्राप्‍त हो गयी। धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश के जुलाहे इस कार्य में कुशल होते गए। वे आस-पास की रियासतों मे घूम-घूम कर कालीन बेचते थे और धन एकत्र करते थे।

ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी के व्‍यापारी इस कालीन निर्माण की कला से बहुत प्रभावित थे उन्‍होने अन्‍य हस्‍तशिल्‍पों का विनाश करना अपना दायित्‍व समझा था लेकिन कालीन की गुणवत्‍ता और इसके यूरोपीय बाजार मूल्‍य को देखकर इस हस्‍तशिल्‍प पर हाथ नहीं लगाया। 1851 में ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी ने धीरे उत्तर प्रदेश के बने कालीनों को विश्‍व प्रदर्शनी में रखा जिसे सर्वोत्‍क्रष्‍ट माना गया। अर्न्‍तराष्‍ट्रीय बाज़ार में कालीन के 6 मुख्‍य उत्‍पादक हैं- ईरान, चीन, भारत, पाकिस्‍तान, नेपाल, तुर्की। नाटेड कालीन निर्यात का 90 प्रतिशत ईरान, चीन, भारत और नेपाल से होता है जिसमें ईरान 30 प्रतिशत, भारत 20 प्रतिशत और नेपाल का हिस्‍सा 10 प्रतिशत है। कालीन निर्यात का 95 प्रतिशत यूरोप और अमेरिका में जाता है। अकेले जर्मनी 40 प्रतिशत कालीन आयात करता है। उत्तर प्रदेश के कालीनो के निर्माण के सम्‍बन्‍ध में आश्‍चर्य जनक बात यह है कि यहा इस उद्योग का कच्‍चामाल पैदा नहीं होता। केवल कुशल श्रम की उपलब्‍धता ही सबसे बड़ा अस्‍त्र है। जिसके बल पर  उत्तर प्रदेश अपनी छाप विश्‍व बाज़ार में बनाए है।

Daya Ram Singh Bhamra


Tuesday, May 30, 2017

मेधावी छात्र-छात्राओं को भुईयार कर्मचारी समिति सम्मानित करेगी




भुईयार समाज जनपद बिजनौर की एक बैठक डिसेंट पब्लिक स्कूल में दिनांक 28.05.2017 को समप्पन हुई जिसमें निर्णय लिया गया कि समाज के मेधावी छात्र-छात्राओं को भुईयार कर्मचारी समिति सम्मानित करेगी। अमर उजाला समाचार पेपर की एक खबर 

BHUIYAR DAYA RAM SINGH BHAMRA
HARIDWAR



Saturday, May 27, 2017

महान वैज्ञानिक जॉन डाल्टन (Weaver-Family) से

Weaver-Family

जॉन डाल्टन (6 सितंबर, 1766 - 7 जुलाई, 1844) एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे। इन्होंने पदार्थ की रचना सम्बन्धी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो 'डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त' के नाम से प्रचलित है।
डाल्टन का जन्म सन् 1766 में इंग्लैंड के एक गरीब जुलाहा-परिवार (Weaver-Family) में हुआ था। बारह वर्ष की आयु में उन्होंने एक शिक्षक के रूप में अपनी जीविका शुरू की। सात साल बाद वह एक स्कूल के प्रिंसिपल बन गए। सन् 1793 में जॉन कालेज में गणित, भौतिकी एवं रसायन शास्त्र पढ़ाने वेफ लिए मैनचेस्टर चले गए। वहाँ पर उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय शिक्षण एवं शोधकार्य में व्यतीत किया। सन 1808 में इन्होंने अपने परमाणु सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जो द्रव्यों के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत साबित हुआ।
डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त
डाल्टन ने द्रव्यों की प्रकृति के बारे में एक आधारभूत सिद्धांत प्रस्तुत किया। डाल्टन ने द्रव्यों की विभाज्यता का विचार प्रदान किया जिसे उस समय तक दार्शनिकता माना जाता था। ग्रीक दार्शनिकों के द्वारा द्रव्यों के सूक्ष्मतम अविभाज्य कण, जिसे परमाणु नाम दिया था, उसे डाल्टन ने भी परमाणु नाम दिया। डाल्टन का यह सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमों पर आधरित था। डाल्टन के परमाणु सिद्धांत ने द्रव्यमान के संरक्षण के नियम एवं निश्चित अनुपात के नियम की युक्तिसंगत व्याख्या की। डाल्टन के परमाणु सिद्धांत के अनुसार सभी द्रव्य चाहे तत्व, यौगिक या मिश्रण हो, सूक्ष्म कणों से बने होते हैं जिन्हें परमाणु कहते हैं।

Daya Ram Singh Bhamra
Social worker of Bhuiyar community
Haridwar

Friday, May 26, 2017

Who are Bhuiyar?

Bhuiyar

The Bhuiyar are an important artisan community some are weave cloths on handlooms and some are agriculturist. They live in Uttar Pradesh, Uttarakhand, Himachal Pradesh, Delhi, Haryana, Punjan,. The term of Bhuiyar is “Bhumi+Hara” it means Landless people. The Bhuiyar or Bhuyiar are listed as a Scheduled Caste (SC) under the provisions of the Indian Constitution. This grants them and other SCs many benefits like fixed, reserved quotas in government jobs, in admissions to various government-sponsored professional colleges and welfare schemes for economic and social improvement and reserved seats in parliament.

Daya Ram Singh Bhamra
Haridwar

Bhuiyar Community from North India
Photo: 08.05.1991

संत कबीर साहेब जी का जन्मोत्सव कें सम्बंध में बैठक

 भुइयार समाज द्वारा संत कबीर साहेब जी का ६१९वाँ जन्मोत्सव मनाने के उपल्क्ष में आयोजित भुइयार समाज की बैठक में श्री दयाराम सिंह भामड़ा जी अपने विचार रखते हुए । बैठक का आयोजन भुइयार धर्मशाला ऋषिकुल हरिद्वार में किया गया।

दयाराम सिंह भामड़ा
बिजनौर


भुइयार धर्मशाला (कबीर आश्रम) ऋषिकुल हरिद्वार

जिस प्रकार एक विशाल पर्वत शिखर मिट्टी के छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनता है। उसी तरह एक  बहु मंजिला भवन भी असंख्या ईंटों का परिणाम होता है। व्यक्तित्व के निखार में न जाने कितनी छोटी-छोटी बातों का योगदान होता है। भुइयार धर्मशाला (कबीर आश्रम) ऋषिकुल हरिद्वार का निर्माण भी इन्हीं बातों का परिणाम है। भुइयार धर्मशाला (श्री कबीर आश्रम) ऋषिकुल हरिद्वार का नया दो मंजिला भवन की स्थापना 28 अप्रैल 2010  दिन बुध्दवार को दयाराम सिंह भामड़ा (मूलनिवासी- बाहुपुरा, बिजनौर), श्री जय सिंह एवं श्री करनपाल सिंह के करकमलों द्वारा शिलान्यास कर किया गया। भुईयार धर्मशाला (कबीर आश्रम) वर्तमान में उत्तराखण्ड राज्य के जनपद हरिद्वार के ऋषिकुल आयुर्वेदिक कालेज के पास स्थित है। भुइयार धर्मशाला (कबीर आश्रम) हरिद्वार की स्थापना करने हेतु श्री दयाराम सिंह एवं श्री जय सिंह जी को समाज के उत्सवों में विद्वानों के विचारों से प्रेरणा मिली। समय समय पर समाज के जलसे एवं उत्सवों में जाने से समाज के प्रबुध्द्जन इकठ्ठा हुए एवं आश्रम की स्थापना के बारे में विचार विमर्श  किया । इस तरह के विशाल उत्सवों में समाज उत्थान के लिए विद्वानों द्वारा प्रचार हुआ तथा अनेकों कार्यक्रम भी हुए।
इन उत्सवों में समाज के श्री दयाराम सिहं भामड़ा, श्री जय सिंह, श्री करणपाल सिंह समाज का गौरव को बढाने वाले व्याख्यान से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भुइयार धर्मशाला हेतु हजारों रूपये दान में दिये तथा श्री जय सिंह जी को श्री कबीर आश्रम धर्मार्थ ट्रस्ट (भुइयार धर्मशाला) ऋषिकुल हरिद्वार का अध्यक्ष बना दिया गया।  

भुइयार धर्मशाला हरिद्वार विकिपिडिया पर


दयाराम सिंह भामड़ा
बाहुपुरा (बिजनौर)

Friday, May 19, 2017

संत कबीर साहेब जी का जन्मदिन

साथियों आपको जानकर हर्ष होगा कि दिनांक 09 जुन 2017 दिन शुक्रवार को प्रात: 10 बजे से संत कबीर साहेब जी का जन्मदिन भुईयार धर्मशाला ऋषिकुल हरिद्वार में भुईयार / कोरी समाज द्वारा  बहुत ही हर्षोउलास से मनाया जायेगा । आप सभी सजातिय बंधुओं की उपस्थिति प्रार्थनीय है।
दयाराम सिंह भामड़ा
हरिद्वार

Friday, April 28, 2017

History of Bhuiyar Dharmshala Haridwar (भुइयार धर्मशाला देवपुरा, ऋशिकुल, हरिद्वार,का इतिहास)

भुइयार धर्मशाला देवपुरा हरिद्वार,का इतिहास

-          सन 1950 में भुइयार / कोरी समाज के पांच व्यक्तियों ने समाज का आश्रम बनाने के लिए 1605 वर्ग फुट जमीन खरीद कर एक कमरा एवं बरामदा बनवाकर महंत बिरबल दास जी को आश्रम में महंत के रूप में रखा |
-          महंत बिरबल दास के बाद आश्रम के महंत रणजीत दास जी रहे |
-          महंत रणजीत दास के बाद 1976 से 1980 तक महंत भगवान दास जी आश्रम के महंत रहे |
-          महंत भगवान दास जी के बाद आश्रम में एक संस्था बनाई गई जिसका नाम “गद्दी कबीर साहेब” रखा गया | सन 1980 से 1984 तक आश्रम के प्रबन्धक के रूप में श्री रतन दास जी तथा अध्यक्ष के रूप मे श्री लोतीराम जी (सहारनपुर) रहे |
-          सन 1982 से 1984 तक संस्था के अध्यक्ष प्र0 मोल्हड़ सिंह रहे |
-          सन 1984 से 1986 तक संस्था के अध्यक्ष श्री जगपाल सिंह रहे |
-          सन 1986 में श्री सूरजमल (बिजनौर) एवं श्री नाथा सिंह (सहारनपुर) ने आश्रम में एक दूसरी समानांतर संस्था का गठन किया, जिसका नाम “कबीरपंथी आश्रम एवं धर्मशाला व्यवस्था सभा हरिद्वार” रखा गया | जिसके अध्यक्ष  श्री सूरजमल एवं महंत श्री सीताराम नांगल (बिजनौर) को नियुक्त किया गया |
-          सन 1986 के कुम्भ मेले के बाद उपरोक्त तीनों व्यक्तियों ने मिलकर आश्रम की जमीन का लगभग आधा हिस्सा (दक्षिण भाग) बेचने की साजिश की | इस हिस्से में आश्रम के प्रथम महंत बिरबल दास जी की समाधि थी | इस समाधि को  उपरोक्त तीनों व्यक्तियों द्वारा तोड़ दिया गया एवं दो दुकानों को  किराए पर भी दे दिया गया | किराएदार द्वारा आश्रम की दुकान पर कब्जा करने की कोशिस की गई| समय -2 पर समाज के व्यक्तियों की  किराएदार से झड़प होती रही | इस घटना के बाद समाज में अविश्वास की भावना पैदा हो गई तथा आश्रम इसी तरह से लावारिस पड़ा रहा |
-          सन 2005 में समाज के कुछ शरारती लोगों ने खाली पड़ी जमीन को फिर बेचने की साजिश रची परंतु समाज के जागरुक लोगों ने इस साजिश का पर्दाफाश करते हुए एक ट्रस्ट का निर्माण किया जिसका नाम “श्री कबीर आश्रम धर्मार्थ ट्रस्ट समिति (रजि0)” रखा | ट्रस्ट को तहसील हरिद्वार एवं चिट्ट फंड सोसायटी देहरादून से पंजीकृत कराया गया | जिसके अध्यक्ष श्री कैलाश चन्द (हरिद्वार) नियुक्त किए गए |

-          आश्रम की जमीन की (लगभग आधा हिस्सा उत्तरी भाग) रजिस्ट्री 2007 में ट्रस्ट के नाम से कर दी गई |
-          18 जून, 2008 को कबीर साहेब जी के जन्म दिन के अवसर पर भुइयार (Bhuiyar) / कोरी (Kori) समाज के व्यक्तियों द्वारा संत कबीर साहेब जी के जन्म दिन के अवसर पर एक बैंड्बाजों एवं झांकियों के साथ शोभायात्रा निकाली जा रही थी, इस शोभायात्रा में लगभग दो से ढाई हजार पुरूष, महिला एवं बच्चे शामिल थे जैसे ही शोभायात्रा का जुलूस धर्मशाला के पास पहुंचा और शोभायात्रा में शामिल व्यक्ति झण्डा फहराने के लिए धर्मशाला के गेट पर एकत्रित हुए तभी कब्जाधारी व्यक्ति ने भुइयार / कोरी समाज के व्यक्तियों से झगड़ा और गाली गलौच करने लगा| उस समय लोगों में अफरा तफरी मच गई एवं उपस्थित नौजवानों में गुस्सा भर गया, जय कबीर के नारे लगाते हुए नौजवान उस कब्जायुक्त ढांचे पर चढ़ गये और जिसके जो हाथ लगा उससे तोड़-फोड़ शुरू कर दी जिससे उस समय उपस्थित भीड़ में इस घटना से जोश भर गया और देखते ही देखते कब्जा किए गये भवन-दुकान को चंद मिनटों में ही नेस्ता नाबूद कर दिया। ये खबर हरिद्वार में आग की तरह पुरे शहर में फैल गई और देखते ही देखते भारी पुलिस बल कबीर आश्रम पर आ पहुंचा और कबीर आश्रम को चारों ओर से घेर कर भुइयार / कोरी समाज के बहुत सारे निर्दोष व्यक्तियों को अरेस्ट कर लिया गया । जिसमें समाज के 12 व्यक्ति जेल चले गए | इन लोगों पर अलग-२ धाराओं में मुकदमें चलाये गये परंतु बाद में कोर्ट ने इन लोगों को बा-इज्जत बरी कर दिया| इस प्रकार  आश्रम के लगभग आधे हिस्से (उत्तरी भाग) को कब्जा मुक्त कराकर खाली करा लिया गया| जब भुईयार एवं कोरी समाज के नौजवान लड़के उस ढांचे को तोड़ रहे थे तो उस समय जो बुज़ुर्ग व्यक्ति थे वे ये नही समझ पा रहे थे कि क्या किया जाये? लड़कों को किस तरह रोका जाये। इस घटना के मेरे अलावा कई लोग चश्मदीद गवाह थे।  अगले दिन 19 जून, 2008 के हरिद्वार के समाचार पत्रों में इस घटना की खबर प्रमुखता से छापी गयी। इस प्रकार आश्रम को खाली करा लिया गया। 
-          सन 2009 में ट्रस्ट का विधिवत चुनाव कराया गया, जिसमें श्री जैय सिंह जी (सहारनपुर) अध्यक्ष पद पर नियुक्त किए गए |  
-          ट्रस्ट की एक बैठक में दयाराम सिंह भामड़ा नें सुझाव दिया कि पुराने भवन को तोड़कर नया भवन बनाया जाये । इस सुझाव पर अमल करते हुए, 28-04-2010 में आश्रम (उत्तरी भाग) का नया दो मंजिला भवन का शिलान्यास दयाराम सिंह भामड़ा, श्री जय सिंह एवं श्री करनपाल सिंह के करकमलों द्वारा किया गया। आश्रम के लगभग आधे हिस्से (दक्षिण भाग) की जमींन पर जिसमें प्रथम महंत बिरबल दास जी की समाधि भी है, उस जमींन पर कोर्ट मे केश चल रहा है जो कि अभी कोर्ट में लम्बित हैं हम भुइयार (Bhuiyar) / कोरी (Kori) समाज के लोग आशा करते है कि कोर्ट का फसला श्री कबीर आश्रम के पक्ष होगा, क्योंकि भुइयार (Bhuiyar) / कोरी (Kori) समाज के लोगों की आस्था संत कबीर साहेब एवं महंत बिरबल दास जी से जुडी हुई है जिनकी समाधि इसी जगह बनी हुई है।  
-        ट्रस्ट द्वारा मई, 2010 में पुराने भवन को तोड़कर आश्रम (उत्तरी भाग) में नया दो मंजिला भवन का निर्माण कराया गया है | भवन निर्माण के लिए ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा दो लाख रूपये तक का दान ट्रस्ट को दिया है | ट्रस्ट के कुल 205 आजीवन सदस्य हैं |
-          ट्रस्ट के नियमावली के अनुसार, आश्रम में केवल भुइयार अथवा कोरी समाज के व्यक्ति ही भाग ले सकते हैं, अन्य किसी समाज अथवा समुदाय के व्यक्ति भाग नही ले सकते | 

Bhuiyar Dharmshala Rishikul Haridwar

New building of Bhuiyar Dharmshala, Devpura, Rishikul Haridwar
Photo by: Daya Ram Singh Bhamra



 Daya Ram Singh Bhamra

Haridwar