Thursday, June 8, 2017

BHUIYAR OR BHUYIAR IN INDAIN GAZETT DATED 29.10.1956

दिनांक 29 अक्टुबर 1956 के भारतीय गज़ट के अनुसार भुइयार जाति उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की लिस्ट में 22वें नम्बर पर है। गज़ट को नीचे दिये लिंक को क्लीक करके देखा जा सकता है।

AS PER INDIAN GAZETT THE BHUIYAR OR BHUYIAR IS 22nd S. NO IN THE SCHEDULED CASTES LISTS OF UTTAR PRADESH


DAYA RAM SINGH BHAMRA

HARDWAR

Tuesday, June 6, 2017

श्री भारत भूषण भगत जी के ब्लॉग से लिया गया लेख मेघनेट (MEGHnet)

यह लेख मेघनेट (MEGHnet) श्री भारत भूषण भगत जी के ब्लॉग से लिया गया लेख है। मेध समाज राजस्थान, गुजरात, पंजाब एवं जम्मु कश्मीर में निवास कर्ता है और कपड़ा बुनने का काम करता है। यह समाज भी भुइयार समाज की तरह ही बुनकर समाज है।
मेघों और मेघवंशियों (एक बुनकर समुदाय) के इतिहास के बारे में मैं जानना चाहता था. राजस्थान के स्वामी गोकुलदास ने 'मेघवंश-इतिहास' और चंडीगढ़ के श्री मुंशीराम भगत ने 'मेघ-माला' नाम से मेघवंशियों पर किताबें लिखी थीं। पिछले कुछ साल में राजस्थान के श्री ताराराम जी ने 'मेघवंश-इतिहास और संस्कृति' लिखी जिसके एक से अधिक खंड आ चुके हैं. कच्छ, गुजरात के श्री नवीन भोइया ने 'बारमतीपंथ' पर कार्य किया है डॉ. ध्यान सिंह का थीसिस - 'पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास' मेघों के पिछले दो सौ साल के इतिहास को छूता है. श्री आर.पी. सिंह की पुस्तिका 'मेघवंश:एक सिंहावलोकन' भी है।
दुनिया का कोई ऐसी कोई बिरादरी नहीं जिसके पूर्वज किसी न किसी समय किसी न किसी ज़मीन के टुकड़े के मालिक या शासक न रहे हों. उसी ज़मीन के प्राकृतिक स्रोतों और धन के लिए युदध लड़े गए, जीते-हारे गए. लड़ाई जीतने वाले ने अपनी कहानी बढ़िया सी लिखवाई और हारे हुओं के इतिहास और रिकार्ड को ख़त्म किया. जो इतिहास लिखा, पढ़ाया या गाया गया वही आने वाली पीढ़ियों के दिमाग़ परछप गया।
मेघवंशी लोग आपस में पूछते रहे हैं कि भाई, हमारा इतिहास क्या है? उत्तर मिलता है कि भाई, पता नहीं चलता कि हमारे पुरखे कौन थे और कहाँ से आए थे. लेकिन ग़रीब समुदायों या जातियों का दिल अनजाने में अपनी ग़ुलामी के इतिहास को महसूस करते है कि कैसे उन्हें खुशहाली के जीवन से बेदख़ल करके गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा गया होगा। यहीं से उनकी मुक्ति की चिंतनधारा शुरू होती है।
लोग मान बैठते हैं कि स्कूल में जो पढ़ाया जाता है केवल वही इतिहास है। ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि मेघों या मेघवंशियों का इतिहास है ही नहीं या पूरी तरह ख़त्म हो चुका है. मेघवंश आज है तो उसका कुछ इतिहास भी है। कई इतिहासकारों ने उसके इतिहास को ढूँढ-ढूँढ कर इकट्ठा किया है।

एक सवाल पूछा जाता है कि क्या मेघवंशियों ने कोई युद्ध लड़ा है? हाँ, इसके बहुत से संकेत हैं कि मेघवंशी योद्धा रहे हैं हालाँकि उनके ज़्यादातर इतिहास का लोप कर दिया है. उस इतिहास के बचे हुए पन्नों को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भली प्रकार समेटा है. उसे पढ़ना चाहिए। नवल वियोगी जैसे अदम्य इतिहासकारों ने नई जानकारियों के साथ इतिहास को फिर से लिखा है। उन्होंने बताया है कि भारत के मूल निवासी और शासक नागवंशी थे जिनके वंश की शुरुआत वृत्र अर्थात मेघऋषि से हुई कही जाती है।
इतिहास में धर्म की कहानी भी ज़रूरी है. कहते हैं कि धर्म के नष्ट होने से देश नष्ट नहीं होता अलबत्ता देश के नष्ट होने से धर्म नष्ट हो जाता है. भारत का इतिहास इससे अलग नहीं हैं। पुराने ज़माने के इस बौध सभ्यता वाले देश के लोगों की हत्याओं, उनके इधर-उधर बिखरने का ही परिणाम है कि आज देशके 85 प्रतिशत लोग गुलामी और ग़रीबी के नतीजों से जूझ रहे हैं। बौध सभ्यता वाला यह देश आत्मरक्षा के लिए संभवतः तैयार नहीं था। आज भारत कुल मिलाकर ग़रीब तबकों का देश है।  
मेघों और मेघवंशियों के गोत्रों पर एक टिप्पणी ज़रूरी है। वे बहुत हद तक ब्राह्मणवादी कर्मकांडों और पंरपराओं में जकड़े हुए हैं। उन कर्मकांडों में अपना गोत्र बताना व्यक्ति की जाति के छोटा या बड़ा होने का पैमाना है। ब्राह्मणवादी कर्मकांडों में इसे उच्चारना होता है। इसके तहत व्यक्ति अपनी जाति का इश्तेहार ख़ुद बाँटता है। लोग अपनी इस मजबूरी के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने इसे ज़बरदस्ती ओढ़ा हुआ है। दूसरी ओर आम आदमी के दिल में धर्म का इतना डर बैठा हुआ है कि धर्म भी खुद को भूत समझने लगा है। न चाहते हुए भी व्यक्ति ऐसी गाय बन जाता है जो केवल मनुवाद और ब्राह्मणवाद को दूध पिलाती है। कोई उस दूध को तरसता रह जाता है तो वह है आपका अपना वंश,आपका अपना बछड़ा।
'हम कहाँ से आए थे'...यह प्रश्न प्रत्येक मानव समूह स्वयं से पूछता है और हर जवाब को अपने हक़ में और ख़ूबसूरत रंगों में देखना चाहता है। मेघ जाति भी यह सवाल सदियों से पूछती आई है और माता-पिता, संबंधी, जानकार लोग अपनी-अपनी जानकारी के हिसाब से कुछ न कुछ बताते रहे हैं।  



मेघों के इतिहास के बारे में मिली जानकारी कई जगह इकतरफ़ा है. कुछ ईमानदारी से लिखी बातें भी मिलीं जो कड़ुवा सच थीं।  आर्यों के आक्रमण से पहले सिंधुघाटी/मुअनजो दाड़ो/हड़प्पा सभ्यता का उल्लेख है जिसके राजा और निवासी मेघवंशी/नागवंशी थे। इसी क्षेत्र को द्रवड़ियन सभ्यता का मूल स्थान भी माना जाता है. यह अब तक पाई गई अपने समय की सब से विकसित सभ्यता थी जिसके निवासी अमन पसंद थे और छोटी-छोटी बस्तियों में रहते थे. कृषि और कपड़ा बुनना उनका मुख्य व्यवसाय था। उन बिखरी हुई छोटी-छोटी बस्तियों के निवासी ईरान आदि की ओर से आए जंगली, हिंसक और खुरदरे आर्यों के आक्रमणों का मुकाबला नहीं कर सके और पराजित हुए। इसके बाद उनकी गुलामी का बुरा समय शुरू हुआ।  इतना जान लेना काफ़ी है कि उस संघर्ष के बहुत बाद यानि ईसा के बाद संस्कृत में लिखे गए वेदों में वृत्रासुर, अहि मेघ मतलब- नाग मेघ, प्रथम मेघ, आदि का उल्लेख है. पौराणिक कहानियों में मेघों, नागवंशियों और उनके राजाओं के बारे में उल्लेख है जिसे विद्वान ऐतिहासिक संकेत भी मानते हैं। उन कहानियों ने मेघों या नागों की ऐसी तस्वीर बनाई है जिसे उनकी पीढ़ियाँ देखना तक नहीं चाहती। उन कहानियों में उस समय के वीर मेघ आर्यों के साथ हुए युद्ध करते और जीतते और अंततः एकता न होने के कारण हारते हुए दिखाई देते हैं। असुरों, राक्षसों, नागों (हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष,प्रह्लाद, विरोचन, बाणासुर,   राजा महाबली, रावण, तक्षक, तुष्टा, शेष, वासुकी आदि) के बारे में जो लिखा गया और उनकी जो तस्वीरें बनाई गईं उन्हें जानबूझ कर ऐसा बना दिया गया कि वे नफ़रत के लायक दिखाई देने लगते हैं। भारत के सभी मूलनिवासी अब इस सच्चाई से सामना कर रहे है।
इतिहास और कहानियों में वैसा ही लिखा जाता है जैसा कि जातने वाला लिखवाता है या लिखने देता है। यही वजह है कि जिस समय में मेघवंशी और इस देश के अन्य मूलनिवासी सत्ता में रहे उसे इतिहास का 'अंधकार युग, अंधकार काल' (dark ages) कहा गया या लिख दिया गया कि उस काल के बारे में जानकारी नहीं मिली है। लेकिन आधुनिक समय में मेघवंशी राजाओं के सिक्के मिले और इतिहास का हिस्सा बन गए। आज इतिहास में वैसा अंधकार काल नहीं है।

कथात्मक शैली में लिखे तथाकथित इतिहास में पूर्ववर्ती संपूर्ण सत्य को खंडित कर एक पक्ष को गौरान्वित कर दिया गया और दूसरे पक्ष को भद्दा चित्रित किया गया।  आज उस दूसरे पक्ष को अपना समझ कर कितनी देर देखा जा सकता है। यह ऐसी फटी पुरानी तस्वीर की तरह है जिस पर गंदे हाथ लग चुके हैं, उसे मरोड़ा गया है और पहचानने लायक नहीं छोड़ा।  इसलिए उस पर खेद जताते जाना और अफ़सोस करते जाना ठीक नहीं। दूसरी ओर अब इतिहासकारों ने वैज्ञानिक और नए सबूतों के आधार पर मेघवंशियों/नागवंशियों के इतिहास पर काम शुरू किया हुआ है।  अब कहानियों के स्थान पर इतिहास सामने आ रहा है। आगे चलकर और भी नई बातें सामने आएँगी।  फिलहाल ज़रूरत है कि अपने वर्तमान को सहेजा जाए और उसे बेहतर बनाया जाए।  

सच यही है कि समय के मुताबिक 'मेघ' पहले भी चमकदार थे और आज भी निखरे हुए भारतीय हैं। उनका मन पहले से अधिक रोशन है।  वे अन्य जातियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर देश की तरक्कीके लिए काम कर रहे हैं।  

आने वाले समय में मेघों की भूमिका और भी सक्रिय होगी।

अंत में बस इतना ही कि अपने अतीत और इतिहास को थोड़ा-सा जान लीजिए जो आपका-सा तो बिलकुल नहीं है, लेकिन वर्तमान सँवारिए, भविष्य बनाइए जो निश्चित रूप से आपका-सा है और बेहतर है।


शुभकामनाएँ.

भुईयार समाज द्वारा सेवानिवृत कर्मचारियों का सम्मान

सेवानिवृत कर्मचारियों को सम्मानित करेगा भुईयार समाज
Publish Date:Sun, 16 Aug 2015 11:12 PM (IST) | Updated Date:Sun, 16 Aug 2015 11:12 PM (IST)
·        
सेवानिवृत कर्मचारियों को सम्मानित करेगा भुईयार समाज
बिजनौर : भुईयार कर्मचारी संघर्ष समिति की बैठक में समाज के सेवानिवृत कर्मचारियों को सम्मानित करने का निर्णय लिया गया। कार्यक्रम के लिए समिति सदस्यों को जिम्मेदारी सौंपी गई।
रविवार को डिसेंट पब्लिक स्कूल में आयोजित भुईयार कर्मचारी संघर्ष समिति की बैठक में 28 जून को हुए छात्र-छात्राओं के सम्मान समारोह की सफलता पर चर्चा की गई। बैठक में समाज के सेवानिवृत कर्मचारियों को सम्मानित करने का निर्णय लिया गया। समिति सदस्यों को अपने क्षेत्र के सेवानिवृत कर्मचारियों की सूची तैयार करने का काम सौंपा गया। वक्ताओं ने समिति का सदस्यता अभियान चलाने तथा ज्यादा से ज्यादा समाज के लोगों को संगठन से जोड़ने को कहा। सभी सदस्यों को दस-दस कर्मचारी सदस्यों को जोड़ने का लक्ष्य दिया गया है। बैठक में मान ¨सह भुईयार, डा. संजीव भुईयार, भोपाल ¨सह भुईयार, देशराज भुईयार, ज्ञान ¨सह भुईयार, कामेंद्र भुईयार, करनपाल भुईयार, ज्ञान ¨सह, केशव शरण, शेर ¨सह भुईयार, नंद किशोर, तेजपाल ¨सह भुईयार आदि ने विचार रखे। अध्यक्षता समिति संयोजक केपी ¨सह भुईयार ने तथा संचालन राजेंद्र ¨सह भुईयार ने किया।

भुईयार समाज समाचार पत्रों की सुर्खियों में


DAYA RAM SINGH BHAMRA
HARIDWAR

Monday, June 5, 2017

Traditional tools of Bhuiyar

Traditional tools of Bhuiyar community


Shuttles with Bobin
  • Loom (करघा)
  • Shuttle (weaving) (नाल)
  • Spinning Wheel (चरखा)
  • Heddles (हत्था)
  • Beaters Combs (पंजा)
  • Bobin (नली)
  • Hajara (हजारा)
  • Koonch (Brush) (कूँच)
  • Spindle (तकुआ)
  • Paddle (पावडे)
  • Tur (तुर)
  • Gardana (गरदाना)
  • Raach (राच)
  • Ghidi (घिड़ी)
  • Stick (खुँमड़ी / लाठी)
  • Rope (रस्सी)

DAYA RAM SINGH BHAMRA

HARIDWAR

Bhuiyar Caste clans (गौत्र)

Bhuiyar Caste clans (गौत्र)

Bhamra (भामड़ा), Narwal (नरवाल), Katariyan (कटारियान), Kankarwal (कंकरवाल), Agrawal (अग्रवाल), Bagwal (बगवाल), Gondwal (गोंदवाल), Uparwal (उप्परवाल), Jag (जाग), Doodhwal (दूधवाल), Mahetiyan (महेतियान/मेतियान), Khagaran (खागरान), Khapriyan (खपर्यान), Vashiyan (वैशियान), Mukaryan (मुखर्यान), Kakran (काकरान), Bharwan (भारवान), Baliyan (बाल्यान/बालियान), Taryan (तर्यान), Taharyan (तहरियान), Ashiyan (आशियान), Tedewal (टेड्वाल), Kait (कैत), Dharwal (धारवाल), Deshwal (देशवाल), Bhagwal (भागवाल), Peetwal (पीतवाल), Jayashwal (जशवाल), Jurwal (जुड्वाल), Granthiwal (ग्रंथीवाल), Kachhwal (काचवाल), Teetwal (टीट्वाल), Galyan/Dalyaan(गाल्यान/दाल्यान) , Taharan (तहरान), Adayan (आदियान), Jaityan (जैतियान), Fariyan (फरियान), Loeewal (लोईवाल), Vojyan (वोजियान), Kritiyan (क्रतियान), Amyan (आम्यान), Chaudhran (चौधरान), Gurjarvan (गुजरवान), Kadyan(कादियान), Dhidival (ढिडिवाल), Bhal (भाल), Maithyan (मैथयान), Puniyan (पुनियान), Charvahan (चर्वाहन), Badgujar/Bangujjar (बड्गुज्जर/बनगुजर), Metram (मेत्रम), Bhagla (भागला), Kashyap (कश्यप), Vaijran वैजरान), Jagpal (जगपाल), Katariya (कटारिया), Dahiya (दहिया), Kankhana (कंखना), Saroha (सिरोहा), Kankarwal (कंकर्वाल), Muwal (मुवल), Dhangad (धनगड), Sidhauliya (सिधौलिया), Doniyal (दौनियाल), Narwal (नरवाल), Mahalwan (महल्वान), Monchhwal (मोछवाल), Panwar/Parwar (पंवार/परवार),,Kachhwaha (कछवाह), Rathee (राठी), Bhadbhujar (बड्भुजर), Bagala (बागला), Gaud (गौड), Bhadbhuja (बड्भुजा), Fariyan (फरियान), Dulaniya दुलानिया),Dhilwania (दिल्वानिया), Tomar (तोमर), Karne (कर्ने), Dhhakran (ढ्करान), Sadhiyan (साधियान), Gogyan (गोदवान), Roliyan (रोलियान), Chhajara (छाजरा), Gogwal (गौदवाल), Chaupra (चौपर), Bhahal (भाहल), Barne भारने)Chauhan,Rathore,Gehlot,ketwal,kathyan, Motwal,Dullyan,Siras Dulyani.

Follower



Bhuiyar society mainly is follower of Kabir Saheb. Kabir is also described in his couplets.
ज्यों उलझै सूत को, सुलझावै भुइयार |
उसने भी यह गुर, पाया सदगुरू द्वार || (कबीर ज्यो. से)
Jyon ulajhai sut ko, sulajhavai bhuiyar |
Usane bhee yaha gur, paya sadaguru dwar|| (From Kabir Jyoti)
जिस तरह् टूटे सूत से, कपड़ा बुने भुइयार |
उसी तरह से सदगुरू, बनावै उच्च विचार || (कबीर ज्यो. से)
Jis tarah tute suta se, kapada bune bhuiyar |
Usi tarah se sadguru, banavai uchcha vichar|| (From Kabir Jyoti)


DAYA RAM SINGH BHAMRA
SOCIAL WORKER OF BHUIYAR COMMUNITY

HARIDWAR

Bhuiyar (भुइयार) on wikipedia

Bhuiyar (भुइयार) 

From Wikipedia, the free encyclopedia
Bhuiyar
Regions with significant populations
India
Languages
Hindi
Religion
Hinduism 100%
The Bhuiyar or Bhuyiar are a Hindu caste found in the state of Uttar Pradesh in India. They have scheduled caste status and are also known as Bhanyar Julaha / Kori / Koli / Tantuvay / Megh / Kabir Panthi /. The traditional occupation of the Bhuiyar caste is weaving but that has declined due to mechanisation.[1]

Origin[edit]

The word bhuiyar is a corruption of the bhumi hara, which in Hindi means a landowner. They are group of Munda tribesmen who settled in southern and Western Uttar Pradesh in the 16th century. They were a community that historically were involved with weaving and some were involved slash and burn agriculture, and occupied the hilly terrain of south Mirzapur district. The Bhuiyar are further divided into sub-divisions, which are referred to as kori / Koli / Kabir Panthi / Bhanyar Julaha. Their main koris are the Baria, Birkunia, Chandnihys, Chetrihya, Chiriha, Dioriya, Khutta, Parha, Patparaha and Sudha. They are strictly endogamous, and practice clan exogamy. The Bhuiyar are found in the districts of Sonbhadra, Bijnor, moradabad, Saharanpur, Meerut, Mujaffar Nagar, Ghaziabad and Mirzapur. They speak Hindi, having long forgotten their Munda language.[1]

Present circumstances[edit]

The Bhuiyar are now a community of settled agriculturists. Their earlier slash and burn practices have disappeared. Most Bhuiyar are a small and medium sized farmers, with a minority being employed as agricultural labourers. Many are now also employed in the mines that have appeared in Mirzapur district. They live in multi-caste villages, occupying their own distinct quarters. They have much in common with neighbouring tribal communities such as the Kol, Agariya and Chero. Each of their settlement contains an informal caste council, known as a biradari panchayat. The panchayat acts as instrument of social control, dealing with issues such as divorce and adultery.[1]
The 2011 Census of India for Uttar Pradesh showed the Bhuiyar population as 28,360.[2]

References[edit]

  1. ^ Jump up to:a b c People of India Uttar Pradesh Volume XLII Part One edited by A Hasan & J C Das pages 307 to 312 Manohar Publications
  2. Jump up^. Registrar General & Census Commissioner, India. Retrieved 2017-02-04.

Sunday, June 4, 2017

संत कबीर साहेब जन्मोत्सव

भुइयार  समाज द्वारा 09 जुन 2017 को  संत कबीर साहेब जन्मोत्सव मनाने का निर्णय ।

अमर उजाला ०४ जुन २०१७ की खबर
















http://epaper.amarujala.com/bj/20170604/07.html?format=img

Bhuiyar Daya Ram Singh Bhamra

Haridwar

Thursday, June 1, 2017

बुनकरों (Bhuiyar) की अकबर के समय की स्थिति


1580 ई0 में मुगल बादशाह अकबर ने फारस से कुछ कालीन बुनकरों (Bhuiyar / Kori) को अपने दरबार में बुलाया था। इन बुनकरों ने कसान, इफशान और हेराती नमूनों के कालीनें अकबर को भेंट की। अकबर इन कालीनों से बहुत प्रभावित हुआ उसने आगरा, दिल्‍ली और लाहौर में कालीन बुनाई प्रशिक्षण एवं उत्‍पाद केन्‍द्र खोल दिये। इसके बाद आगरा से बुनकरो का एक दल जी0 टी0 रोड के रास्‍ते बंगाल की ओर अग्रसर हुआ। रात्रि विश्राम के लिए यह हल घोसिया-माधोसिंह में रूका। इस दल ने यहाँ रूकने पर कालीन निर्माण का प्रयास किया। स्‍थानीय शासक और बुनकरों (जुलाहों) के माध्‍यम से यहाँ कालीन बुनाई की सुविधा प्राप्‍त हो गयी। धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश के जुलाहे इस कार्य में कुशल होते गए। वे आस-पास की रियासतों मे घूम-घूम कर कालीन बेचते थे और धन एकत्र करते थे।

ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी के व्‍यापारी इस कालीन निर्माण की कला से बहुत प्रभावित थे उन्‍होने अन्‍य हस्‍तशिल्‍पों का विनाश करना अपना दायित्‍व समझा था लेकिन कालीन की गुणवत्‍ता और इसके यूरोपीय बाजार मूल्‍य को देखकर इस हस्‍तशिल्‍प पर हाथ नहीं लगाया। 1851 में ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी ने धीरे उत्तर प्रदेश के बने कालीनों को विश्‍व प्रदर्शनी में रखा जिसे सर्वोत्‍क्रष्‍ट माना गया। अर्न्‍तराष्‍ट्रीय बाज़ार में कालीन के 6 मुख्‍य उत्‍पादक हैं- ईरान, चीन, भारत, पाकिस्‍तान, नेपाल, तुर्की। नाटेड कालीन निर्यात का 90 प्रतिशत ईरान, चीन, भारत और नेपाल से होता है जिसमें ईरान 30 प्रतिशत, भारत 20 प्रतिशत और नेपाल का हिस्‍सा 10 प्रतिशत है। कालीन निर्यात का 95 प्रतिशत यूरोप और अमेरिका में जाता है। अकेले जर्मनी 40 प्रतिशत कालीन आयात करता है। उत्तर प्रदेश के कालीनो के निर्माण के सम्‍बन्‍ध में आश्‍चर्य जनक बात यह है कि यहा इस उद्योग का कच्‍चामाल पैदा नहीं होता। केवल कुशल श्रम की उपलब्‍धता ही सबसे बड़ा अस्‍त्र है। जिसके बल पर  उत्तर प्रदेश अपनी छाप विश्‍व बाज़ार में बनाए है।

Daya Ram Singh Bhamra


Tuesday, May 30, 2017

मेधावी छात्र-छात्राओं को भुईयार कर्मचारी समिति सम्मानित करेगी




भुईयार समाज जनपद बिजनौर की एक बैठक डिसेंट पब्लिक स्कूल में दिनांक 28.05.2017 को समप्पन हुई जिसमें निर्णय लिया गया कि समाज के मेधावी छात्र-छात्राओं को भुईयार कर्मचारी समिति सम्मानित करेगी। अमर उजाला समाचार पेपर की एक खबर 

BHUIYAR DAYA RAM SINGH BHAMRA
HARIDWAR



Saturday, May 27, 2017

महान वैज्ञानिक जॉन डाल्टन (Weaver-Family) से

Weaver-Family

जॉन डाल्टन (6 सितंबर, 1766 - 7 जुलाई, 1844) एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे। इन्होंने पदार्थ की रचना सम्बन्धी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो 'डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त' के नाम से प्रचलित है।
डाल्टन का जन्म सन् 1766 में इंग्लैंड के एक गरीब जुलाहा-परिवार (Weaver-Family) में हुआ था। बारह वर्ष की आयु में उन्होंने एक शिक्षक के रूप में अपनी जीविका शुरू की। सात साल बाद वह एक स्कूल के प्रिंसिपल बन गए। सन् 1793 में जॉन कालेज में गणित, भौतिकी एवं रसायन शास्त्र पढ़ाने वेफ लिए मैनचेस्टर चले गए। वहाँ पर उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय शिक्षण एवं शोधकार्य में व्यतीत किया। सन 1808 में इन्होंने अपने परमाणु सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जो द्रव्यों के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत साबित हुआ।
डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त
डाल्टन ने द्रव्यों की प्रकृति के बारे में एक आधारभूत सिद्धांत प्रस्तुत किया। डाल्टन ने द्रव्यों की विभाज्यता का विचार प्रदान किया जिसे उस समय तक दार्शनिकता माना जाता था। ग्रीक दार्शनिकों के द्वारा द्रव्यों के सूक्ष्मतम अविभाज्य कण, जिसे परमाणु नाम दिया था, उसे डाल्टन ने भी परमाणु नाम दिया। डाल्टन का यह सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमों पर आधरित था। डाल्टन के परमाणु सिद्धांत ने द्रव्यमान के संरक्षण के नियम एवं निश्चित अनुपात के नियम की युक्तिसंगत व्याख्या की। डाल्टन के परमाणु सिद्धांत के अनुसार सभी द्रव्य चाहे तत्व, यौगिक या मिश्रण हो, सूक्ष्म कणों से बने होते हैं जिन्हें परमाणु कहते हैं।

Daya Ram Singh Bhamra
Social worker of Bhuiyar community
Haridwar